दक्षिण पूर्व रेलवे के CPRO संजय घोष की पारखी कलम से समझिये ‘Contact’ और ‘Connection’ के बीच का फर्क

संजय घोष, मुख्य जन सम्पर्क अधिकारी, दक्षिण पूर्व रेलवे
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संजय घोष

20 साल पहले की बात है। एक पत्रकार दिल्ली स्थित विश्वविद्यालय (University) में एक शिक्षक का साक्षात्कार ले रहे थे। पत्रकार ने शिक्षक से कहा कि आपने कल अपने वक्तव्य में कॉन्टैक्ट (Contact) और कनेक्शन (Connection) की बात कही थी। इसे लेकर दुविधा की स्थिति है। इसको थोड़ा विस्तार में समझाएँ।

शिक्षक ने अपने चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट बिखेरते हुए पत्रकार से पूछा – क्या आप कोलकाता में रहते हैं? शिक्षक के इस प्रश्न से पत्रकार को लगा जैसे वे उनके सवाल का जवाब देने से बचना चाहते हैं इसलिए वे बातचीत को बदलनेे की कोशिश कर रहे हैं। बावजूद इसके पत्रकार ने बिना अपने चेहरे की आभा को बदले शिक्षक से कहा, ‘जी, मैं कोलकाता में रहता हूँ।’ शिक्षक ने पत्रकार से अगला सवाल किया। आपके घर में कौन-कौन हैं? पत्रकार ने कहा, ‘माँ का देहांत हो चुका है। पिता जी, 3 भाई और एक बहन है। सभी भाई-बहन विवाहित हैं।

शिक्षक ने अपना अगला प्रश्न पूछा, ‘क्या आपकी बात आपके पिता से होती है? सवाल सुनते ही पत्रकार भ्रमित हो गए, यह सोचकर कि यह कैसा सवाल है? शिक्षक ने फिर पूछा, आपकी अपने पिता से अंतिम बार बात कब हुई थी?

पत्रकार ने सवालों से हो रही अपनी झुँझलाहट को दबाते हुए कहा करीब एक महीने पहले पिता जी से बात हुई थी। शिक्षक ने तपाक से अगला सवाल पूछा, आपकी अपने भाई-बहनों से नियमित मुलाकात होती है? आप पूरे परिवार के साथ एक साथ अन्तिम बार कब मिले थे? इन सवालों से पत्रकार को ऐसा महसूस हुआ जैसे शिक्षक ने उनका ही साक्षात्कार लेना आरम्भ कर दिया है।

हालांकि शिक्षक के सवालों ने पत्रकार को परेशान कर दिया था। पत्रकार ने दबी हुई आवाज में कहा 2 साल पहले क्रिसमस पर पूरे परिवार के साथ मुलाकात हुई थी। 2 दिन हम साथ रहे थे। शिक्षक ने एक बाद एक कई सवाल किए, जैसे – आप अपने पिता के पास कितनी देर बैठे थे अन्तिम बार?, आपने क्या उनके साथ ब्रेक्फस्ट, लंच या डिनर किया था?, वे कैसे हैं, क्या यह सवाल उनसे पूछा था?, माँ के मरने के बाद उनका समय कैसे कट रहा है, क्या यह पूछा था?

इन सवालों ने पत्रकार को अंदर से झकझोर दिया। उनकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। शिक्षक ने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा शर्म की बात नहीं है। अफसोस न करें। मुझे खेद है अगर आपको मेरी बातों से अनजाने में कोई दुःख पहुँचा हो तो। लेकिन ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आपका, आपके पिता के साथ Contact है, Connection नहीं।

कनेक्शन हृदय से हृदय का होता है। एक साथ बैठना, भोजन को बाँटकर खाना, एक दूसरे का ख्याल रखना, स्पर्श करना, हाथ मिलाना, आँखों में देखना, एकसाथ वक्त बिताना आदि कनेक्शन की निशानी है। शिक्षक ने पत्रकार से कहा, आपका अपने परिवार के साथ कॉन्टैक्ट है लेकिन कनेक्शन नहीं है। अपने परिवार में कनेक्शन रखना बेहद जरूरी है।

आज हमारे पास हजारों कॉन्टैक्ट हैं लेकिन कनेक्शन नहीं हैं! हम गर्व से कहते हैं कि हमारे फेसबुक में इतने हजार मित्र हैं। लेकिन अच्छा कनेक्शन, बेहद कम। यदि सोशल मीडिया के कनेक्शन से मित्र हैं तो इस मित्र के Wrong Connection (गलत कनेक्शन) की श्रेणी में आने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। सोशल साइट्स की वजह से ही काफी हद तक ‘प्रेमी की वजह से पति की हत्या’, ‘दूसरा विवाह’, ‘ऑनलाइन ठगी’ जैसी सुर्खियाँ अखबारों में अपनी जगह बनाती हैं।

यह सही समय है ‘Contact’ और ‘Connection’ के बीच के फर्क को समझने का क्योंकि यदि अभी नहीं सम्भले तो आने वाले समय में जोखिम के और भी घातक होने की बात निश्चित है।

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