1971 के पाकिस्तानी हमले के दिन इन्दिरा गाँधी के साथ सीताराम शर्मा की संस्मरण यात्रा

सीताराम शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं समाज चिन्तक
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सीताराम शर्मा की अनुभवी कलम से

यह बात आज से क़रीब 50 वर्ष पहले की है, उस समय मेरी उम्र २४-२५ वर्ष की थी,पत्रकारिता से जुड़ गया था।

प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी के साथ यह दिलचस्प बैठक बराबर याद रहेगी। लघु समाचारपत्र एसोएसोसिएशन के प्रतिनिधि मंडल जिसका मैं एक सदस्य था, का 3 दिसंबर 1971 को इंदिरा जी से राजभवन में मुलाक़ात का समय निर्धारित था। प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार एच वाई शारदा प्रसाद हमें लेने आए, साथ ही कहा “5-10 मिनट से अधिक समय नहीं दे पाएँगी” हमने अपनी बात इसलिए जल्दी जल्दी कहनी आरंभ कर दी। इसी बीच इन्दिरा जी ने कहा अगर आपको असुविधा नहीं हो तो मैं आराम से बैठ जाती हूँ। बहुत निश्चिंत एवं सहज दिख रही थीं। मैंने उनसे पूछा “आप अपनी समाजवादी तथा प्रगतिशील नीतियों को लागू कैसे करेंगी जबकि नौकरशाही और व्यवस्था इनके विरुद्ध हैं। उन्होंने साफ़ कहा “यह सब बदलना होगा और बदलेगा, मुझे आपका साथ चाहिए“ वे साफ़ तौर पर बड़े अख़बारों से नाराज़ थीं तथा छोटे तथा मझोले समाचारपत्रों को बढ़ावा देना चाहती थीं।

कोलकाता स्थित राजभवन में 3 दिसम्बर 1971 को भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी के साथ वरिष्ठ पत्रकार सीताराम शर्मा

बातचीत के दौरान एक सहायक ने एक पर्ची प्रधानमंत्री को दी। इन्दिरा जी ने उसे पढ़ा और पुनः स्वाभाविक रूप से बातचीत आरंभ कर दी। बाद में हमें पता चला कि पर्ची में सूचना थी कि पाकिस्तान ने भारत के पाँच हवाई अड्डों पर बमबारी कर युद्ध आरंभ कर दिया है। इन्दिरा जी के चेहरे पर हमने एक शिकन तक नहीं देखी। उसी रात वे हवाई मार्ग से दिल्ली गईं। उनकी उड़ान के पहचाने जाने पर पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा मार गिराए जाने का ख़तरा था। दिल्ली पालम हवाई अड्डे पर उतरने पर इन्दिरा जी ने अपने सचिव पी एन धर से कहा “दिल्ली पहुँच पाउँगी इसका पूरा भरोसा नहीं था।“

इसी भेंट बैठक में एक और दिलचस्प घटना घटी। सुविनय दास प्रेस फ़ोटोग्राफ़र मेरा पुराना मित्र था, अचानक उसने दंडवत् करते हुए मैडम के साथ फ़ोटो खिंचवाने का अनुरोध किया। इन्दिरा जी ने कहा वे फ़ोटोग्राफ़रो के साथ वर्ष में एक बार अपने जन्मदिन पर फ़ोटो उतरवाती हैं लेकिन वे राज़ी हो गईं, पूछा फ़ोटो कौन लेगा। मैं तैयार हो गया। सुविनय वर्षों तक फ़ोटो लोगों को दिखाता रहा। मैं बराबर उससे कहता फ़ोटो के नीचे फ़ोटो ग्राफ़र का नाम होना चाहिये। जब यह सब हो रहा था मैं सोच रहा था कि इन्दिरा जी के मन में क्या चल रहा होगा, पाकिस्तानी हमले को लेकर। उस घटना को याद कर आश्चर्य होता है कि इतना “विस्फोटक“ समाचार मिलने के बाद भी किस तरह वे सामान्य बनी रहीं और हमारे साथ फ़ोटो खिंचवाती रहीं। मुस्कराहट उनके चेहरे पर बराबर तैर रही थी। यह उनकी अद्भुत क्षमता एवं साहस का एक उदाहरण था।

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