डॉ. एस. आनंद की कलम से व्यंग्य कविता ‘घर ही छोड़ दूं!’

डॉ. एस. आनंद, वरिष्ठ साहित्यकार, कथाकार, पत्रकार, व्यंग्यकार
Advertisement

घर ही छोड़ दूं!

यार! बीवी रोज झगड़ती है
जबरन रोज लड़ती है
कल मेरा मोबाइल तोड़ दिया
आज डायरी को भी छोड़ लिया।
कहती है-
रात-दिन मोबाइल में घुसे रहते हो
अपनेआप को क्या समझते हो?
मैं जुगाड़ करके घर चलाती हूं
बच्चों की भूख मिटाती हूं
और तुम सोकर मोबाइल चलाते हो
झूठ-मूठ का अहसान जताते हो।
बदलो अपना ढंग
नहीं तो कर दूंगी बदरंग
सोचता हूं-
इससे रिश्ता ही तोड़ दूं
या चुपके से घर ही छोड़ दूं!
मुआ कोरोना जो न कराए
अभी आगे कैसा दिन दिखाए?

 डॉ. एस. आनंद, वरिष्ठ साहित्यकार, कथाकार, पत्रकार, व्यंग्यकार

यह भी पढ़ें : डॉ. एस. आनंद की कलम से व्यंग्य कविता ‘गुटबन्दी’

Advertisement
     

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here