डॉ. एस. आनंद की कलम से व्यंग्य कविता ‘सच बनाम झूठ’

डॉ. एस. आनंद, वरिष्ठ साहित्यकार, कथाकार, पत्रकार, व्यंग्यकार
Advertisement

सच बनाम झूठ

अगर मेरे पिता
जीवित होते आज
तो मैं उनसे पूछता
किस उसूल की बातें
करते थे आप?
कहते थे-
सच की विजय होती है सदैव
झूठ पराजित होता है बार-बार
मगर यहां तो सब
उल्टा-पुल्टा हो रहा है
झूठ घोड़े बेचकर
बेख़ौफ़ सो रहा है
और सच
पुक्का फाड़कर रो रहा है।

● डॉ. एस. आनंद, वरिष्ठ साहित्यकार, कथाकार, पत्रकार, व्यंग्यकार

यह भी पढ़ें : डॉ. एस. आनंद की कलम से व्यंग्य कविता ‘भारत महान!’

Advertisement
     

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here