‘ख़ाकी’ की कलम से ‘गज़ल’ की गली (21)

मुरलीधर शर्मा ‘तालिब’, संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध), कोलकाता पुलिस
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गजल संग्रह : हासिल-ए-सहरा नवर्दी

कोई हमदर्द कब नहीं मिलता
जब ज़रूरत हो तब नहीं मिलता

एक बन्दा तो क़ायदे का मिले
ग़म नहीं मुझको रब नहीं मिलता

तोड़ने पड़ते हैं दर-ओ-दीवार
कोई दरवाज़ा जब नहीं मिलता

जिससे मिलता हूँ झुक के मिलता हूँ
बा-अदब बे-अदब नहीं मिलता

शह् र-ए-दिल में ख़ुलूस का सामाँ
आगे मिलता था अब नहीं मिलता

क्यों समुन्दर की तह में जाकर भी
तिश्नगी का सबब नहीं मिलता

तालिब-ए-फ़न (कला प्रेमी) को फ़न मिले ‘तालिब’
ये हुनर बे-तलब नहीं मिलता

■ मुरलीधर शर्मा ‘तालिब’, संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध), कोलकाता पुलिस

यह भी पढ़ें : ‘ख़ाकी’ की कलम से ‘गज़ल’ की गली (20)

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