‘पूर्व प्रधानमंत्री इन्द्र कुमार गुजराल’ के साथ वरिष्ठ पत्रकार सीताराम शर्मा की संस्मरण यात्रा

सीताराम शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं समाज चिन्तक
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गुजराल साहब जैसे सजजन, बुद्धिमान, आदर्शवादी, मूल्य-आधारित राजनेता भारतीय राजनीति में बिरले रहे हैं।

सीताराम शर्मा

इन्द्र कुमार गुजराल से मेरा पहला परिचय लगभग 52 वर्ष पूर्व साल 1969 में हुआ था, तब वे सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे और मैं पत्रकारिता से जुड़ा था। उनमें लोगों को अपना बनाने की अद्भूत क्षमता थी। संभवतः इसी गुण के कारण दक्षिणपंथी से वामपंथी सभी दलों ने गुजराल साहब को बिखरी राजनीति के दौर में सर्वसम्मति से 1997 में भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए चुना।

”मेरे रूस में राजदूत रहते हुए मास्को क्यों नहीं आते, पत्नी को भी साथ लाइये” बड़ी आत्मीयता एवं सहजता के साथ गुजराल साहब ने मुझे निमंत्रण दिया। 12 से 20 मई, 1978 (9 दिन), मैं पत्नी सहित गुजराल साहब का मास्को में मेहमान रहा। उन दिनों रूस में शाकाहारी भोजन की बड़ी समस्या थी। गुजराल साहब, विशेषकर उनकी पत्नी शीला जी ने हमारे शाकाहारी भोजन का विशेष ख्याल रखा। शीला जी ने बताया कि मास्को में दाल, चावल, गेहूँ, सब्जी आदि की बहुत किल्लत है। दूतावास के लिए अधिकतर ऐसे सामान एयर इण्डिया के जहाज से भारत से आते हैं। प्रवास के दौरान गुजराल साहब के साथ काफी समय बिताने एवं राजनैतिक चर्चा करने का अवसर मिला। गुजराल साहब इन्दिरा गांधी के काफी नजदीकी रहे थे। आपातकाल में संजय गांधी की नाराजगी के चलते उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से हटाकर योजना मंत्री बना दिया गया एवं बाद में वे रूस में राजदूत बने जो एक तरह से उनका राजनैतिक निष्कासन था।

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जनवरी-फरवरी 1990 की बात है। गुजराल साहब वी. पी. सिंह सरकार में विदेश मन्त्री थे। एक दिन उनके कार्यालय से फोन आया कि साहब मिलना चाहते हैं, कब दिल्ली आने का कार्यक्रम है। तारीख एवं समय तय हो गया। उत्सुकतावश मैं उनके निजी सचिव, जो मेरे पुराने परिचित थे, को फोन किया कि साहब ने क्यों बुलवा भेजा है? जोर देने पर उन्होंने बताया कि ”साहब आपको भारत का राजदूत बनाकर विदेश भेजना चाहते हैं, बाकी बात साहब से कीजिएगा।” मैं बहुत खुश, बड़े मान-सम्मान की बात है, यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। पत्नी उत्साहित कम, चिन्तित अधिक नजर आयी – कितने साल के लिए जाना है?, बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा? यहां काम-धन्धा कौन देखेगा?, अपना काम छोड़ नौकरी करेंगे? मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। यह सरकारी नियुक्ति होगी, जैसे ही सरकार गई मुझे इस्तीफा देना पड़ेगा। वी. पी. सिंह सरकार डांवाडोल है। फिर मेरे व्यवसाय को कौन देखेगा। साल-दो साल बाद वापस आने पर फिर धन्धा शुरू करना सम्भव नहीं। वास्तविकता ने मेरे उत्साह पर पानी फेर दिया।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इन्द्र कुमार गुजराल के साथ वरिष्ठ पत्रकार सीताराम शर्मा

दिल्ली रवाना होते समय मेरी चिन्ता थी कि प्रस्ताव पर अपनी राय कैसे व्यक्त करूँगा। यह मेरा सौभाग्य रहा कि गुजराल साहब ने घर पर समय दिया। जब उन्होंने कहा, ”आपको डिप्लोमेटिक असाइन्मेन्ट देना चाहता हूँ, लाओस में राजदूत बनने की संभावना है।” उस समय श्रीमति शीला गुजराल उपस्थित थीं। मेरी असमर्थता के कारणों को जहाँ गुजराल साहब अजीब निगाहों से देख-सुन रहे थे वहीं शीला भाभी मेरे साथ थीं। उन्होंने गुजराल साहब को यह कहकर बात ही खत्म कर दी – आपकी सरकार का क्या भरोसा, इनका परिवार है, काम-धन्धा है, साल-दो साल बात वापस आना पड़ेगा तो क्या होगा? गुजराल साहब जोर से हँसे और बोले, ”आप दोनों इस सरकार को साल-दो साल ही देते हैं।”

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कुछ महीने बाद ही 10 नवम्बर 1990 को वी. पी. सिंह सरकार का पतन हो गया एवं चन्द्रशेखर ने नये प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। चन्द्रशेखर ने गुजराल साहब से विदेश मन्त्री बने रहने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने इसे सिद्धान्ततः अनुचित ठहराते हुए अस्वीकार कर दिया।

गुजराल साहब जैसे सजजन, बुद्धिमान, आदर्शवादी, मूल्य-आधारित राजनेता भारतीय राजनीति में बिरले रहे हैं। उनसे मेरी अन्तिम मुलाकात उनके निवास स्थान 5 जनपथ (दिल्ली) में हुई, जब उन्होंने अपनी आत्म-जीवनी की हस्ताक्षरित प्रति मुझे भेंट की।

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